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कविताएँ " ढूँढने से भी नहीं मिलते अब

 क्या वक़्त था वो क्या जमाना था?  आज से कई गुना अच्छा,  तो गुजरा हुआ हमारा  बचपन का जमाना था....  कंक्रीट की दीवारों में भावनाओं का सीलन नहीं होता खपरैल की छत की तरह हवेलियों में वो सुकून कहीं नहीं....  चूल्हे की आग में सिंकती थी रोटियां उसके स्वाद में लूटा दूं मैं सैकड़ों हीरे मोतियां माँ की हाथों में जो लज्जत है ओ दुनिया में कहीं नहीं....  सिलबट्टे से पिसी चटनी में हरी धनिये की महकती खूशबू है  वो जमाने में कहीं नहीं.... भाई बहनों के संग झगड़ते थे, रोटियाँ की पपच्चियों के लिए वो प्यार, वो शरारत सारे जहाँ में कहीं नहीं..... कुंइयां की पानी जैसा मिनरल्स वाटर में नहीं रहा स्वाद  आजकल लोगों के लहजों में वो मिठास कहीं नहीं.... ढूँढने से भी नहीं मिलते अब वो अपनापन और स्नेह  बड़े हो जाने के बाद वो खुशियाँ  मिलती कहीं नहीं...